[9/10, 9:56 PM] Rudra Raaz: 'पगला गयीं हूँ मैं , चले जाओ किसी अच्छी के पास . जैसे बहिन बनाई है बीबी भी बना लेना कोई . तुमसे तो दिमाग ही फिजूल है . ..कुछ हो जाय तो फिर मुझे मत दिखाना अपनी लटकन सी सूरत .'
और वह अपने भाइयों के लिए लाई राखियों को सहेजने लगी .
वो मन ही मन सिर्फ यही सोच रहा था कि ये भरे पेट वाले इतने खाली क्यों होते हैं . .कभी कभी सोचता -आमिर घर में शादी करके मानों फस ही गया है !
इसके लिए शायद राखी की भी कीमत रुपयों में हो ..
इससे मुह लगाना समुद्री मागर्मक्ष में मुह हाथ डालने जैसा है।
छोडो..उसके लिए इस साडी की कीमत तय करना उसका घटिया सोच है।
मगर मेरे बहिन लिए इसकी कीमत सिर्फ प्यार है। उससे वर्षो से दूर हु
उसके आँसू और उस पीले धागे की कीमत सिर्फ प्रेम और विश्वास है .. फिर एक और बहन को खोना नही चाहता. बहन सम्मान तो भाई का फर्ज है....
सुबह फ्लाइट से उसकी पत्नी अपने मइके चली गयी राखी बांधने
और ये भी गांव की ट्रेन पकड़ अपनी बहन से राखी बान्धवने
निकल गया।।।
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ये दोनों लघु कथा की कड़ी prove करता है सब कुछ insan की सोच निर्भर है।
व्यंग्य -राजनैतिक पिशाचों के लिए सब कुछ सम्भव है.
[9/10, 9:57 PM] Rudra Raaz: 'भैया ! एक किलो सेब और एक दर्जन केले दे दो !' और उसने पचास का नोट आगे कर दिया .
पहला ग्राहक कुछ बोलना चाहता था मगर दुकानदार ने उसे इशारा कर बोलने से मना कर दिया .
दुकानदार ने सामान महिला के झोले में डाल दिया और बाकी पैसे उसे दे दिए . जैसे ही वह बाहर गयी दुकान से पहला ग्राहक गुस्से से बोला -
'कैसे अजीब आदमी हो यार ! मुझे इतना महंगा और उसे इतना सस्ता माल . क्या मेरे पैसे मुफ्त के आते हैं ?'
'भाई साहब ! वो एक विधवा और चार बच्चों की माँ है . उसका बच्चा असाध्य रोग से लड़ रहा है. वह किसी से मदद नहीं लेती . इसलिए मैं उसे कम दाम पर सामान बेचकर उसकी मदद करता हूँ . आप से मैंने कोई बेईमानी नहीं की है .'
'मुझे माफ़ करना भाई साहब ! मैंने आपको गलत समझा , आपने बहुत सही किया . ऐसा कीजिये मेरा सेब और केला डबल कर दीजिये . अकेले तुम ही इस पुण्य के भागीदार क्यों बनों....कुछ हिस्सा मुझे भी मिलना चाहिए ,,,
(एक व्हाट्सअप मेसेज से )
राष्ट्र मंदिर
==========लघु कहानी -15
'भाई साहब ! कहाँ से आ रहे हैं ?'
'भाई जी ! बिटिया के लिए रिश्ता तलाश रहा हूँ पर लोगों के मुँह बहुत बड़े हैं , कहीं कुछ चाहिए, कहीं कुछ .'
'एक पुजारी से रिश्ता करोगे ?'
'पुजारी से ? मजाक क्यों करते हो भाई ! वैसे ही परेशान हूँ .'
'नहीं भाई ! मजाक नहीं कर रहा हूँ . सरकारी नौकरी है और ज्यादातर पूजा में व्यस्त रहता है . बहुत ही मजबूत है और दबंग भी .'
'कहाँ रहता है ? मंदिर कहाँ है ? किस का बेटा है ?'
'फिलहाल समंदर में है , जहाज उसका पूजा स्थान है और सारा देश उसका मंदिर है और मेरा बेटा है ....फौजी है जल सेना का .'
'अरे ! भाई , पहले क्यों नहीं बताया ....मैं बेकार ही मकानों में दामाद तलाश रहा था . राष्ट्र मंदिर का पुजारी दामाद कौन नहीं चाहेगा !'
'देश बदल रहा है
==========लघु कहानी -15
'डाक्टर साहब ! ये लीजिये ऑपरेशन के पैसे.' और उसने मेज पर पैसे रख दिए .
'कितने हैं ?'
'जितना आपने कहा था जी ! पूरे दो लाख हैं .'
'भाई ! वो तो GST आने से पहले का था . तीस हजार और लाओ !'
'पर साहब ! डाक्टर नहीं बदला , मरीज और मर्ज़ नहीं बदला तो फिर बढ़ोत्तरी किसलिए ?'
'भाई ! देश बदल रहा है .'
[9/10, 9:58 PM] Rudra Raaz: उसके बाद दोस्तों के धर्म, जाति, सामाजिक पृष्ठभूमि सबपर हम गौर करने लगे..लोगों के सरनेम पर नज़र जाने लगी..उनके गृह क्षेत्र पर ध्यान जाने लगा..जिन दोस्तों के साथ कभी मतभेद नहीं होते थे उनसे विचारधारा के आधार पर मनभेद होने लगे..
पहले मुलाकातों पर जहाँ एक दुसरे की ख़ुशी परेशानी साझा होती थी वहां अब विचारधाराओं के टकराव की बहस होने लगी...
कई बार रस्ते में दोस्तों के मिलते समय नमस्कार इसलिए भी नहीं हुआ क्योंकि राजनीतिक रूप से दोनों के विचार पृथक थे।
ये सब कुछ शुरू हुआ 18 के बाद...Adult franchisee वाले अधिकार के बाद...अपनी पसंदीदा पार्टी का सिम्बल जब दोस्ती पर भारी पड़ गया तब से ये सब शुरू हुआ..यानि इसकी जड़ है सियासत
निष्कर्ष ये है कि जो लोगों के बीच बड़ी बड़ी दीवारें बन गयी हैं न जो दिखती तो नहीं है पर हैं बहुत विशाल...इसकी मूल जड़ ही सियासत है..
सियासत हर रोज़ इस दीवार में जानदार सीमेंट डालकर इसे रंग रोगन कर मजबूत बना रही है...
[9/10, 9:59 PM] Rudra Raaz: तांक झांक करते पाये जाते थे…ये इफवाह फैलती गई | किसी ने कहा जहां काम करती है वहां के मालिक के साथ चक्कर हे जिसके जो मुंह मे आया वो बोला | आखिर कब तक कोई सहे एक सुबह जब दोपहर तक वो ना दिखी तो पड़ोसी ने दरवाजा खटखटाया मगर कोई सुगबुगाहट नही | धीरे धीरे सारा मोहल्ला इक्टठा हो गया | दरवाज़ा तोड़ा तो पाया | खुद पंखे से लटकी है और बच्चा जिसे शायद ज़हर दिया था बिस्तर पे मरा पड़ा है | लोगो के दिल फिर दया ना ईई फिर फुस्फुसीये पाप का बोझ ले के कब तक जीती मगर डायन ने बच्ची को क्यों मारा | बच्ची को मारती ना तो क्या करती छोड़ देती तीकी फिर उसके उसपे कोई गंदी नज़र डाले उसका दीम तय करे अच्छा किया दो मासुम को इस नर्क से मुक्ती दिलाई |
ये कहानी किसी एक औरत की नही ये कहानी है हर शहर हर गांव हर कस्बे मे बैठी उस औरत की जिसके साथ मजबुरीयां हैं और वहां बैठे हैं मजबुरीयों का फायदा उठीमे वीले | अगर मान गई तो ठीक नही तो बदनाम कर के उस से आत्महत्या तो करवा ही देंगे | तरस आता है ऐसे लोगों पर कैसे अपने गुनाहों की लेखी देंगे…
मै राहुल इस कहानी के माध्यम से यही बताना चाहता हूं के जी लेने दें किसी को अपनी ज़िंदगी अपने कुछ पल के काम सुख के लिये मत मारें अपना ज़मीर औरत की इज्ज़त करना सीखें ये लोग जो ऐसी सोच रखते हैं…किसी तरह की गलती के लिये माफी
[9/10, 10:00 PM] Rudra Raaz: लघुकथा
दोषी.....
जैसे ही विशिष्ट अदालत के जज ने दोषी, ढोंगी बाबा के खिलाफ फैसला देकर उसे उम्र कैद की सजा सुनाई पीड़ित लड़की ने हाथ जोड़कर जज साहब को धन्यवाद देते हुए कहा--
"इस ढोंगी बलात्कारी के साथ ही यही सजा मेरे माँ-बाप को भी दी जाए।"
"क्या... "
उपस्थित सब लोगों पर जैसे बिजली गिर पड़ी।
"यह क्या कह रही हो?" जज साहब ने आश्चर्य से पूछा।
" हाँ जज साहब। मैं ठीक कह रही हूँ। इस ढोंगी के साथ ही इस अपराध में मेरी जैसी हर पीड़ित लड़की के माँ-बाप भी बराबर के दोषी होते हैं।" लड़की ने शांत स्वर में उत्तर दिया।
जज दिलचस्पी से लड़की को देखने लगे। और लड़की के माँ-बाप सिर पीटने लगे-
"पागल हुई गयी है क्या छोरी। होस में तो है। कइं बोल रही सै?"
"मैं बिल्कुल ठीक बोल रही हूँ। पूरे होश में। वो बाबा ने नहीं बुलाया था मन्ने अपने आश्रम में। उसने तो जो किया गलत किया। लेकिन मैं तो तुम्हारी बेटी हूँ। मेरे अच्छे बुरे की जिम्मेदारी तो तुम्हारी थी। तुम कैसे अपनी बेटी को उसके आश्रम में छोड़ आये?"
लड़की के माँ-बाप आवाक हो गए। जज साहब सोच में पड़ गए।
"लड़की शाम सहेलियों के साथ घर से बाहर जाने को या पिक्चर जाने को बोले तो घरवालो के सीनों पर सांप लौट जाता है, रूढ़ियाँ बीच मे आ जाती है। परिवार की इज्जत पर बन आती है। लेकिन उसी लड़की को साध्वी बनाकर ऐसे ढोंगियों के हवाले करते तुम्हारी इज्जत में बट्टा नहीं लगता?
जज साहब। ढोंगी बाबाओं से भी पहले ऐसे भक्तों को जेल में डालना चाहिए। ये सब बाबा इन्ही भक्तों के खड़े किए हुए राक्षस हैं।"
स्तब्ध अदालत को सांप सूंघ गया।
******सबक सीखो इन घटनाओं से कोई बाबा बहकावे में न आये *****मेहनत करो आगे बढ़ो।
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फेसबुक से अलविदा कुछ वक्त के लिए
मस्तियां पढ़ते पढ़ते हो तो ज्यादा अच्छा रहता है ये एहसास कहानियो और कविताओं का पिछले 3 महीनो में लगभग हिंदी के 250 से ज्यादा रचनाये पढ कर एक नया
अनुभव से आया और हिंदी लेखन में बहुत कुछ सीखा भी
आज
बहुत दिनों बाद दीपकवा (दोस्त) का फ़ोन आया
उ प्रोफेसर बन गया है सुन के डबल ख़ुशी हुआ
एक तो दोस्त प्रोफ़ेसर वो भी इंग्लिश का दूसरा की तुम जैसे ईमानदार और मेहनती लोग सरकारी कॉलेज में पहुचे हो।
अंग्रेजी प्रोफ़ेसर बनने के लिए तुम्हे कितना ज्यादा मेहनत करना पड़ा होगा हम समझ सकते है
चुकी
हमलोग हिंदी मध्यम से पढ़े लिखे है स्कुल में छत से पानी टपकता था ज्यादा तर क्लास पेड़ के नीचे ही किया।
6ठी कक्षा से तो a से apple स्टार्ट किये थे हमलोग।
... उसका एक बात हमे झकझोर गया
"राहुल तुमसे हमे कुछ एक्स्ट्रा उम्मीद है!
तुम अच्छा लिखने लगे हो पर अभी फेसबुक में टाइम waste ना कर।
सोशल मीडिया पे
कई बातों पर रिएक्ट करने का मन होता है फिर जान बूझ कर नहीं करता चुकी रिएक्शन leads to frustration. action leads to reaction.
दुनिया प्रतिक्रियाओं से नहीं बदलती. दुनिया छोटे छोटे कामों से बदलती है.ऐसा मेरा अनुभव है.
अब धीरे धीरे पढ़ाई के competion मोड में चले जाना है कुछ कर दिखाना है।
इस हफ्ते के बाद व्यस्त हफ्ते शुरु होने वाले हैं.
अलविदा दोस्तों !
आप सभी ने मुझे बहुत सराहा , कोसने के साथ साथ सचेत भी किया और अपना प्यार दिया .
जो समझ आता था आपसे सांझा किया . कितना साहित्य था नहीं मालूम , मगर सुकून जरुर था मेरे लिए .
आपको कितना परेशान किया या सुकून दिया ये आप ही जानते हैं . कुछ समय अब आप लोगों से दूर रहूंगा
[9/10, 10:01 PM] Rudra Raaz: =======
'क्या हुआ जी ? आज मुंह क्यों लटका हुआ है ?' पत्नी ने पूछा .
'कुछ ख़ास नहीं , बस जरा सा मन अनमना है न जाने क्यों ?'
'जानती हूँ तुम्हें बहुत अच्छे से . कोई बात न हो और तुम उदास ही जाओ ऐसा संभव नहीं है . कह दो जो भी कहना है .'
'दरअसल बात ये है कि मेरी एक दोस्त है . कभी मिला नहीं उस से सिर्फ बात होती है और आजकल बहुत परेशानी में है . उसके पति की तबियत बहुत खराब है और उसे दिल्ली इलाज के लिए आना है राजीव गांधी केंसर अस्पताल में . मदद करना चाहता हूँ पर कैसे करूँ ये बात परेशान कर रही है . पैसे उसे चाहियें नहीं और इतनी छुट्टियाँ लेकर उसकी मदद की नहीं जा सकती .'
'बस ....इतनी सी बात के लिए खुद को परेशान कर रहे हो . मुझसे बात तो कर ली होती ....शक करना औरत का स्वभाव है . वह प्यार करती है तो शक भी करती है और प्यार करती है तो उसे निभाना भी आता है . अपनी दोस्त को कहो कि वो यहाँ आ जाए . एक कमरा हम उसके लिए एडजस्ट कर देंगे और अगर तुम्हारी दोस्त है ...इसका मतलब मेरी दुश्मन ही होगी ये भी तो नहीं है ...दिल्ली में तो उसकी दोस्त मैं भी हो सकती हूँ न !'
तभी फ़ोन बजा और पत्नी ने उठाया .
'हेल्लो ! अपर्णा, मैं रमेश की पत्नी बोल रही हूँ बहिन . तुम भाई साहब को लेकर सीधे यहाँ आओ .मैं तुम्हे पता मसेज कर रही हूँ .'
'यार ! यु आर ए गुड फ्रेंड .' और वह पत्नी के साथ लिपट गया .
'हटो ! तुम उसके पुराने दोस्त होकर इतने परेशान हो ये मैं कैसे देख सकती हूँ ...मेरे तो उस से भी पुराने दोस्त और पति हो ...तुम हो।
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[9/10, 10:02 PM] Rudra Raaz: लड़का तो मिल जाएगा
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'बकवास बंद कर अपनी , जहाँ हम कहते हैं शादी कर ले . घर की इज्जत भी तो कोई चीज है .'
'कितने में ख़रीदा है लड़का ? मेरे सुख का दाम क्या लगाया है उन्होंने ? आज भी वही आदिम सोच ...बेटी को सुखी करने के लिए दहेज़ दे रहे हैं . साला जब चाहे जैसे चाहे जिस्म नोचेगा और दामाद कहलायेगा . बदन पर नाखूनों के निशान देखकर भी आप कुछ कह न सकोगे ...हाथ जोड़कर सब सहोगे . इसी को कहते हो न अरेंज मैरेज !'
'चार जमात पढ़कर तू क्या हमारी अम्मा हो गयी है ? माँ-बाप का जरा ख्याल नहीं तुझे !'
'ख्याल है तभी तो कह रही हूँ ....लड़का तो मिल जाएगा ......प्रेमी नहीं मिलेगा ! जब प्रेम ही नहीं होगा तो सुख कैसा ? कसाई को बेचते भी हो और दाम भी देते हो ....बकरी से भी गयी गुजरी हूँ क्या मैं ?'
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अभी की राजनितिक दौर में शायद ये हर शख्स के साथ हो रहा है...
बचपन से किशोरावस्था तक के दिन याद आते हैं..जिस इंसान से मिलते थे वो दोस्त होता था..उसकी जाति, उसके धर्म, उसके सामाजिक status, पारिवारिक पृष्ठभूमि से कोई मतलब नहीं था..
स्कूल के समय तो दोस्त ऐसे लगते थे जैसे अपने ही परिवार के सदस्य हों..कई बार समझ ही नहीं आता था कि ईद पर हमारे यहाँ सेंवई क्यों नहीं बनती और इसे खाने के लिए नसीम या इबरार के घर क्यों जाना पड़ता है..
स्कूल लाइफ तक ज़िन्दगी नाम लेते लेते, काम लेते लेते, मौज और आराम लेते लेते कटी
फिर हम सब हो गए 18 वर्ष के..Adult franchisee दिमाग पर हावी हो गया..सियासत के मायने समझने लगे क्योंकि मताधिकार मोड एक्टिव हो गया..फिर नाम के साथ उपनाम भी महत्वपूर्ण हो गया..
उसके बाद दोस्तों के धर्म, जाति, सामाजिक पृष्ठभूमि सबपर हम गौर करने लगे..लोगों के सरनेम पर नज़र जाने लगी..उनके गृह क्षेत्र पर ध्यान जाने लगा..जिन दोस्तों के साथ कभी मतभेद नहीं होते थे उनसे विचारधारा के आधार पर मनभेद होने लगे..
पहले मुलाकातों पर जहाँ एक दुसरे की ख़ुशी परेशानी साझा होती थी वहां अब विचारधाराओं के टकराव की बहस होने लगी...
कई बार रस्ते में दोस्तों के मिलते समय नमस्कार इसलिए भी नहीं हुआ क्योंकि राजनीतिक रूप से दोनों के विचार पृथक थे।
ये सब कुछ शुरू हुआ 18 के बाद...Adult franchisee वाले अधिकार के बाद...अपनी पसंदीदा पार्टी का सिम्बल जब दोस्ती पर भारी पड़ गया तब से ये सब शुरू हुआ..यानि इसकी जड़ है सियासत
निष्कर्ष ये है कि जो लोगों के बीच बड़ी बड़ी दीवारें बन गयी हैं न जो दिखती तो नहीं है पर हैं बहुत विशाल...इसकी मूल जड़ ही सियासत है..
सियासत हर रोज़ इस दीवार में जानदार सीमेंट डालकर इसे रंग पेंट कर मजबूत बना रही है..
इसमें खाश बात यह है कि स्टाफ से लेकर रूम पार्टनर सब धीरे धीरे मुह मोड़ लेते है अपने अहंकारी बिचार वे इतने कमजोर हो गए है कि सामने रहने वाले साथ जीने वाले को समझेंगे नही मगर साध्वी, योगी , केजरी कन्हैया और रविश की बाते दिलो दिमाग में आसानी से बिठा लेते है।