RRudra raaj Blog
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My IV Post

Ek baar jarur padho

बाहर दाना और पानी रखती थी . एक रोज कोई पंछी बेचनेवाल गुजर रहा था तब उसने एक पिंजरे में सुन्दर चिड़िया देख उसे ख़रीदा था . फिर उसकी अकुलाहट देख उसका जोड़ा भी बनवाया था . दोनों चोंच लड़ाते चहकते रहते थे .

वह बहुत खुश थी . लेकिन समय सदैव एक सा नहीं रहता . जब-जब उसके मन में अपने बेटे का ख्याल आता . उस चिड़िया की आवाज उसे ऐसा लगता जैसे काट डालेगी कलेजे को .

गर्मियों के दिन थे . चिड़िया पिंजरे में बहुत फुदक रहीं थीं . उसने देखा तो पिंजरे एक हल्का नीला -सफ़ेद अंडा पड़ा हुआ है . बुढ़िया जैसे पगला गयी थी . उसने तुरंत डंडा उठाकर पिंजरे पर दे मारा . पीली जर्दी बाहर निकल पड़ी थी .

चिड़ियाँ बहुत दुखी होकर पंख फडफडा रहीं थीं . इधर बुढ़िया भी आंसू बहा रही थी . मत रोओ तुम ...ये दुःख कुछ देर का है ....जब बच्चे उड़ जायेंगे तो ये दुःख मरने तक हो जाएगा ...मैं तुम्हारा हाल अपने जैसा नहीं होने दूँगी. नहीं बनने दूँगी तुम्हें ...माँ !

समसामयिक संदर्भ में ऐसो आराम के लिए लोगो को अपने घर परिवार को छोड़ने की सोच
जीवन की ये भी रीत बन सकती है की माँ बच्चे को जन्म ही देना छोड़ दे ।
#मुंबई#बेटा#माँ कंकाल# बेहद दुखद -झकझोर दिया मुझे।

मुस्कान की पूँजी
==========लघु कहानी -

पिछले दो तीन दिन से हेमलता न तो नेट पर एक्टिव दिखाई दी न ही कोई फोन आया तो उसने सोचा कि घर चलकर हालचाल मालूम किया जाय उसका . उसने टैक्सी बुक की और पहुँच गयी .

दरवाजा किसी पुरुष ने खोला था . पहली बार उसे देखा था . मन आशंका से भर गया .

'भाई साहब ! हेमलता तो ठीक हैं न ? कहाँ हैं वो ?'

'आइये ! सब ठीक है . दरअसल हम दोनों जरा बाहर चले गए थे .'

हेमलता आते ही सीमा से गले लगी . आज उसके चेहरे पर पहले जैसी मायूसी नहीं थी वह बहुत खुश थी .

'अरे! क्या बात है ये साठ का फूल तो पच्चीस की तरह मुस्कुरा रहा है ! नजर न लग जाय मेरी ....हा हा हा ' नुपुर बोली .

'हाँ, यार ! कब तक मन को मारती अपने . बच्चे अपने घरों के हो गए . मैं चौकीदार बनी अपने रुदन की सीटियाँ कब तक बजाती रहती सिसकियों से . सोच लिया कि जब वो खुश हैं तो मैं क्यों दुखी रहूँ .
ये मेरे फेसबुक के दोस्त थे . पत्नी का स्वर्गवास हो गया . बच्चे बाहर सेटल हैं . अकेले थे . मुझे समझते भी हैं . सो हमने दोस्ती को रिश्ते में बदल लिया ...अब तू इन्हें जीजा जी कह सकती है ...हा हा हा .' हेमलता उसे बाहों में भरते हुए बोली .

सीमा एकटक निहारती रही . उसे बहुत अच्छा लग रहा था . उसे अहसास हुआ कि औलादों की भेजी गयी पूँजी से ज्यादा जरुरी है जीवन की असली ख़ुशी ...मुस्कान की पूँजी .
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जीत व्यावहारिकता की, हमे लगता है भविष्य शायद यही है।
सुखद बदलाव की तरफ़ इशारा है। वृद्धाश्रम में रहने से अच्छा है कि दो लोग एक दूसरे का सहारा बन जायें।
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