'पगला गयीं हूँ मैं , चले जाओ किसी अच्छी के पास . जैसे बहिन बनाई है बीबी भी बना लेना कोई . तुमसे तो दिमाग ही फिजूल है . ..कुछ हो जाय तो फिर मुझे मत दिखाना अपनी लटकन सी सूरत .'
और वह अपने भाइयों के लिए लाई राखियों को सहेजने लगी .

वो मन ही मन सिर्फ यही सोच रहा था कि ये भरे पेट वाले इतने खाली क्यों होते हैं . .कभी कभी सोचता -आमिर घर में शादी करके मानों फस ही गया है !
इसके लिए शायद राखी की भी कीमत रुपयों में हो ..
इससे मुह लगाना समुद्री मागर्मक्ष में मुह हाथ डालने जैसा है।
छोडो..उसके लिए इस साडी की कीमत तय करना उसका घटिया सोच है।
मगर मेरे बहिन लिए इसकी कीमत सिर्फ प्यार है। उससे वर्षो से दूर हु
उसके आँसू और उस पीले धागे की कीमत सिर्फ प्रेम और विश्वास है .. फिर एक और बहन को खोना नही चाहता. बहन सम्मान तो भाई का फर्ज है....
सुबह फ्लाइट से उसकी पत्नी अपने मइके चली गयी राखी बांधने
और ये भी गांव की ट्रेन पकड़ अपनी बहन से राखी बान्धवने
निकल गया।।।
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ये दोनों लघु कथा की कड़ी prove करता है सब कुछ insan की सोच निर्भर है।

व्यंग्य -राजनैतिक पिशाचों के लिए सब कुछ सम्भव है.